अधिवक्ता ललित मिगलानी ने की सख्त कानूनी कार्रवाई और युवाओं के पुनर्वास की मांग

हरिद्वार: आज समाज के सामने नशा एक विकराल चुनौती बनकर खड़ा है। यह न केवल युवाओं के स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार को बर्बाद कर रहा है, बल्कि हंसते-खेलते परिवारों की खुशियाँ भी छीन रहा है। नशे की चपेट में आकर युवा अपने जीवन के सबसे सुनहरे अवसर खो रहे हैं, जिससे उनके माता-पिता और परिजनों को भारी मानसिक, आर्थिक और सामाजिक पीड़ा झेलनी पड़ रही है।इस गंभीर समस्या पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए उत्तराखंड उच्च न्यायालय, नैनीताल के प्रख्यात अधिवक्ता ललित मिगलानी ने कहा है कि नशे की समस्या का समाधान केवल जागरूकता अभियानों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसके लिए सामाजिक सहभागिता, प्रभावी पुलिस कार्रवाई, कानूनी जागरूकता और पीड़ितों के उपचार व पुनर्वास पर विशेष ध्यान देना बेहद जरूरी है।अधिवक्ता ललित मिगलानी ने जानकारी दी कि भारत में मादक पदार्थों और मनःप्रभावी पदार्थों के अवैध कारोबार पर लगाम कसने के लिए ‘स्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 (NDPS Act)’ लागू है। इस अधिनियम के तहत प्रतिबंधित नशीले पदार्थों का अवैध उत्पादन, निर्माण, कब्जा, खरीद-बिक्री, परिवहन और तस्करी गंभीर दंडनीय अपराध हैं। अपराध की प्रकृति और बरामद मादक पदार्थ की मात्रा (विशेषकर व्यावसायिक मात्रा) के आधार पर कठोर कारावास का प्रावधान है। इसके अलावा, अधिनियम की धारा 27 के तहत नशीले पदार्थों के सेवन के लिए भी दंड तय किया गया है।उन्होंने जोर देकर कहा कि पुलिस और प्रवर्तन एजेंसियों को नशे की सप्लाई करने वाले मुख्य नेटवर्क और तस्करों के खिलाफ समन्वय बनाकर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। साथ ही, आम नागरिकों से भी अपील की गई है कि वे किसी भी संदिग्ध गतिविधि की सूचना तुरंत पुलिस को दें।अधिवक्ता मिगलानी ने स्पष्ट किया कि जहाँ एक तरफ अवैध कारोबारियों के प्रति नरमी नहीं बरती जानी चाहिए, वहीं दूसरी ओर नशे की लत से जूझ रहे युवाओं को केवल तिरस्कार की दृष्टि से देखना उचित नहीं है। उन्हें चिकित्सकीय सहायता, काउंसलिंग और पुनर्वास के अवसरों की सख्त आवश्यकता है। उन्होंने बताया कि NDPS अधिनियम में निर्धारित शर्तों के अधीन, यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से मान्यता प्राप्त या सरकारी अस्पताल में नशामुक्ति का उपचार करवाता है, तो कुछ मामलों में अभियोजन से प्रतिरक्षा का भी प्रावधान है।अधिवक्ता मिगलानी ने अभिभावकों से अपील की है कि वे बच्चों की दिनचर्या, उनके दोस्तों की मंडली और मानसिक स्थिति पर विशेष नजर रखें तथा उनके साथ संवाद का रिश्ता मजबूत करें। साथ ही उन्होंने शिक्षण संस्थानों से आग्रह किया कि विद्यालयों और महाविद्यालयों में नियमित रूप से कानूनी जागरूकता शिविर आयोजित किए जाएं, ताकि युवा नशे के घातक स्वास्थ्य और कानूनी परिणामों से अवगत हो सकें।अंत में, अधिवक्ता ललित मिगलानी ने कहा कि नशे के खिलाफ यह लड़ाई अकेले पुलिस या प्रशासन की नहीं, बल्कि हर नागरिक और परिवार की सामूहिक जिम्मेदारी है। हमें मिलकर एक ऐसा समाज बनाना होगा जहाँ नशे के सौदागरों पर कानून का डंडा चले और भटके हुए युवा फिर से मुख्यधारा में लौटकर सम्मानजनक जीवन जी सकें।

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